शिव पार्वती विवाह। बालकांड भाग 15, 16, 17
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भगवान शिव और पार्वती की शादी बड़े ही अनोखे ढंग से आयोजित हुई। हिमाचल की तरफ से कई सारे उच्च कुलों के
राजा-महाराजा और शाही रिश्तेदार इस शादी में शामिल हुए, लेकिन शिव की ओर से कोई रिश्तेदार नहीं था, क्योंकि वे किसी भी परिवार से ताल्लुक नहीं रखते थे। सप्तर्षियों द्वारा विवाह की तिथि निश्चित कर दिए जाने के बाद भगवान् शंकरजी ने नारदजी द्वारा सारे देवताओं को विवाह में सम्मिलित होने के लिए आदरपूर्वक निमंत्रित किया और अपने गणों को बारात की तैयारी करने का आदेश दिया। ब्रहमा जी और विष्णु जी अपनी अपनी मण्डली के साथ शंकर जी के विवाह में पधारे । नंदी , क्षेत्रपाल, भैरव आदि गणराज सभी कोटि-कोटि गणों के साथ निकल पड़े। ये सभी तीन नेत्रों वाले थे। सबके मस्तक पर चंद्रमा और गले में नीले चिन्ह थे। सभी ने रुद्राक्ष के आभूषण पहन रखे थे। सभी के शरीर पर उत्तम भस्म पुती हुई थी। इन गणों के साथ शंकरजी के भूतों, प्रेतों, पिशाचों की सेना भी आकर सम्मिलित हो गई। इनमें डाकनी, शाकिनी, यातुधान, वेताल, ब्रह्मराक्षस आदि भी शामिल थे। इन सभी के रूप-रंग, आकार-प्रकार, चेष्टाएँ, वेश-भूषा, हाव-भाव आदि सभी कुछ अत्यंत विचित्र थे। किसी के मुख ही नहीं था और किसी के बहुत से मुख थे। कोई बिना हाथ-पैर के ही था तो कोई बहुत से हाथ-पैरों वाला था। किसी के बहुत सी आँखें थीं और किसी के पास एक भी आँख नहीं थी। किसी का मुख गधे की तरह, किसी का सियार की तरह, किसी का कुत्ते की तरह था। वे सभीअपनी मस्ती में मस्त होकर नाचते-गाते और मौज उड़ाते हुए महादेव शंकरजी के चारों ओर एकत्रित हो गए। बैल पर सवार शिव ने बड़ा ही अदभुत शिंगार किया। सिर पर जटाओं का मुकुट, जटाओं में गंगा, मस्तक पर चन्द्रमा, कानों में बिच्छू के कुंडल, गले में सर्पों की माला, हाथों में सर्पों के कंगना, मृगछाला, तन पर भस्म, बगल में कुण्डी सोटा दबाए, भंग और धतूरे की बोरियाँ लाद कर डमरू बजाते नन्दी पर सवार शिव दूल्हे के रूप में शोभायमान हो रहे थे। उधर हिमालय ने विवाह के लिए बड़ी धूम-धाम से तैयारियाँ कीं और शुभ लग्न में शिवजी की बारात हिमालय के द्वार पर आ लगी। पहले तो शिवजी का विकट रूप तथा उनकी भूत-प्रेतों की सेना को देखकर मैना बहुत डर गईं और उनके साथ अपनी कन्या का विवाह करने के लिए मना कर दिया किन्तु फिर नारद जी के समझाने पर वह मान गई। शुभ मुहूर्त देख कर पार्वती को मण्डप में बुलाया गया । और शास्त्रोक्त विधि से शिव और पार्वती का विवाह सम्पन्न हुआ। बोलिए शंकर भगवान की जय माता पार्वती की जय
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