सती जी का तप सफल होना। बालकांड भाग 13

जय माॅ  अम्बिका 🙏🙏🙏🙏
       सती जी  ने दक्ष के यज्ञ में अपना शरीर त्यागने के पश्चात राजा हिमाचल के घर गौरी रूप में जन्म लिया और शंकर जी को पति रूप में प्राप्त करने के लिए तप किया । मन के तप में लीन रहने से देह की सुद्धि बिसर गई।
      1000 वर्ष तक पार्वती ने कंदमूल और  फल खाकर तप किया । 100 वर्ष तक केवल  शाक खाकर तप किया । फिर  कुछ दिन केवल जल और वायु का सेवन किया । 3000 वर्ष तक सूखी बेल पत्तियों का भोजन किया । तथा उसके  वह भी छोड़ कर भूखी प्यासी रह कर ही तपस्या की। तभी से उनका नाम अपर्णा पड़ा ।
       जब उनका शरीर अत्यंत क्षीण हो गया तब आकाश वाणी हुई कि हे गिरिराज कुमारी तुम्हारा तप सफल हुआ अब आपको शीघ्र ही त्रिपुरारी मिलें गे। अब तुम अपने पिता के  साथ घर चली जाओ। शीघ्र ही इस आकाश वाणी के प्रमाण स्वरूप सप्त ॠषी तुम्हारे पास आएंगे ।
      उधर जब से सती ने शरीर त्यागा तब से शिवजी पूर्ण वैराग हो गए थे। सदैव प्रभू राम के ध्यान में मग्न रहते। तब राम जी शिवजी के सम्मुख प्रकट हुए । और पार्वती के जन्म से लेकर तप करने तक का सारा वर्तांत उन्हें सुनाया और कहा कि यदि आप की मुझ मे सच्ची प्रीती है तो जाकर उमा से विवाह  कर लीजिये । इतना कहकर प्रभू अंतर्ध्यान हो गए ।
       तब शंकर जी ने सप्त ऋषियों को पार्वती की परीक्षा  लेने भेजा। सप्त ऋषियों ने बहुत  प्रकार से शिवजी की निन्दा की और कहा कि हे उमा तुम सब प्रकार से योग्य और गुणवती हो। शिव जी तुम्हारे योग्य नहीं है । तुम अपना ये हठ छोड़ कर अपने समान किसी ओर से शादी कर लो किन्तु पार्वती उनकी किसी बात मे ना आई।
जय भोले नाथ जय उमा भवानी 🙏🙏🙏🙏🙏



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