दक्ष के यज्ञ में सती दहन बालकांड भाग 11

जय श्री राम 🙏जय भोले नाथ 🙏जय माॅ सती 🙏
      
          श्री राम की परीक्षा लेने के पश्चात शंकर जी ने सती को त्याग दिया और तपस्या करने बैठ गए तब सती जी जान गई कि स्वामी ने मुझे त्याग दिया है। वे इस दुख को सह नही पा रही थी और मन ही मन  बहुत  ही पश्चाताप करने लगी। कि मैंने रघुनाथ जी का अपमान  किया और पति के वचनों पर संदेह किया इसी से विधाता ने  मुझे यह दारुण दुःख दिया। जब शंकर जी कई सालों तक तप से नहीं जागे तो सती जी ने प्रभू श्री राम जी से मन ही मन यह बिनती की कि हे प्रभू यदि आप सच में  दीन दयालु कहलाते हो तो कुछ एसा उपाय करो कि मेरा यह शरीर शीघ्र ही नष्ट हो जाए क्योंकि पति के त्याग के  बाद मैं जीवित नही रहना चाहती। सती जी इस प्रकार इस दारूण दुख के साथ  समय बिताने लगी।
       उधर 87 हजार साल व्यतीत होने पर शंकर जी की समाधि खुली। और वे राम राम का सुमिरिन करने लगे। स्वामी को समाधि से जागा देख सती जी उनके चरणों में जा पढ़ी। तब शंकर जी ने उन्हें अपने सन्मुख आसन दिया और राम नाम की कथा कहने लगे।
       उसी समय सती के पिता दक्ष को ब्रहमा जी से प्रजा पति का पद प्राप्त हुआ। प्रजा पति का पद प्राप्त करते ही उसे बहुत अभिमान हो गया। और उसने एक यज्ञ का आयोजन किया जिसमें सभी देवताओं को आमंत्रण दिया । परन्तु शिवजी को आमंत्रण नही दिया। उनके यज्ञ में गंधर्व नाग किन्नर ऋषि मुनि देवता सभी अपने अपने विमानों मे बैठ कर यज्ञ में जाने लगे।
       जब सती जी ने आकाश मार्ग से सभी को जाते देखा तो शंकर जी से इसका कारण पूछा तब महादेव जी ने सब समाचार कह सुनाया । अपने पिता के घर यज्ञ की बात सुनकर सती जी ने जाने की इच्छा प्रकट की । महादेव जी ने समझाया कि उन्होंने हमें आमंत्रित नही किया। बिना आमंत्रण के तुम्हे वहां नही जाना चाहिए । परन्तु सती जी  जाने की जिद करने लगी। तब शंकर जी ने अपने कुछ मुख्य गणों को साथ भेज कर उन्हें जाने की आज्ञा दे दी।
       जब सती जी पिता के घर पहुंची तो दक्ष के भय से किसी  ने उनका स्वागत नहीं किया। केवल उनकी माता ही स्नेह से मिली। पिता दक्ष ने कुछ भी कुशल नही पूछी। यज्ञ में सती जी ने देखा कि सभी के लिए स्थान था किन्तु शिवजी के लिए कोई स्थान नही था। पति का ऐसा अपमान देख कर क्रोध से सती जी का शरीर जलने लगा। पति का ये अपमान सहने योग्य नहीं था तब सती ने क्रोध में सभी सभासदो को सुनाकर कहा कि जिन लोगों ने शंकर जी की निन्दा सुनी या कही है वे तुरंत इसका फल पाएंगे और हे पिता जी आप भी बहुत पछताओगे। मेरा ये जो शरीर दक्ष से उत्पन्न हुआ है मैं अभी इस को नष्ट  कर दूंगी । इतना कहते ही सती जी ने योगाग्नि से अपने शरीर को भस्म कर दिया। यह देख कर वहां कोलाहल मच गया सभी सभासद यज्ञ छोड़ कर भागने लगे शिवजी के गणों ने यज्ञ को विध्वंस कर दिया।
       सती जी ने मरते समय यह वरदान माँगा था कि जन्म जन्म तक मेरी शिवजी के चरणों में प्रीती बनी रहे। अतः उन्होंने राजा हिमाचल के घर गौरी रूप में जन्म लिया और शंकर जी को पति रूप में प्राप्त करने के लिए तपस्या किया ।
     गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि उसके  पश्चात दक्ष की जो गति हुई उसे सभी भली भांति जानते हैं इसलिए मैंने यह कथा संक्षेप मे कही।
बोलो माता सती की जय🙏🙏🙏🙏

 


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