सती जी का राम जी की परीक्षा लेना। बालकांड भाग 10
जय श्री राम 


एक बार भगवान भोले नाथ सती जी के साथ कैलाश पर्वत की ओर जा रहे थे। उसी समय प्रभू श्री राम अपने बनवास काल मे दण्डक वन में विचरण कर रहे थे। और सीता जी की खोज मे दोनों भाई दुखी दिखाई दे रहे थे। शंकर जी अपने मन में विचार करते जा रहे थे कि कैसे प्रभू के दर्शन होंगे । क्योंकि इस अवतार में प्रभू राम गुप्त रूप में प्रकट हुए थे। तभी मार्ग में राम जी से भेंट हुई। श्री राम ने पिता सहित अपना नाम बताया और शंकर जी को प्रणाम किया। उधर शंकर जी भी प्रभू राम की जय बुला कर सती जी के साथ अपने रास्ते चल दिए । शंकर जी मन ही मन आनंदित हो रहे थे। अपने प्रभू के दर्शन से उनके मन मे प्रेम समा नही रहा था।
शंकर जी की यह दशा सती जी से छुपी ना थी। उनके मन में संदेह उत्पन्न हो गया कि शंकर जी तो अविनाशी हैं सारा जगत उन्हें पूजता है तो उन्होंने एक राजा के बेटे को सच्चिदानन्द कह कर प्रणाम क्यूँ किया। क्या वो सच्चिदानन्द विष्णु भगवान एक मनुष्य के रूप में अवतार लेगें? और अगर ये सच भी है तो भी वो घट घट की जानने वाले क्या एक मूर्ख मनुष्य की भांति स्त्री को ढूंढते फिरेगे ?
शंकर जी से सती जी के मन की व्यथा छुपी ना थी। अतः उन्होंने सती जी को समझाने की बहुत कोशिश की परन्तु उनके मन से शंका समाप्त नही हो रही थी। तब शंकर जी ने कहा कि यदि तुम्हारे मन में इतना संदेह है तो जैसे तुम्हारा संदेह दूर हो वैसे परीक्षा लो। तब तक मैं यहाँ बट वृक्ष के नीचे बैठ कर प्रतीक्षा करता हूँ ।
तब सती जी जिस रास्ते से प्रभू श्री राम आ रहे थे उसी रास्ते पर सीता जी का ही रूप धर कर टहलने लगी। लक्ष्मण जी ने दूर से सती जी को पहचान लिया। वे मन में सोचने लगे का सती जी ने सीता जी का रूप क्यों धरा है। तभी श्री राम चन्द्र जी ने उनके पास जाकर प्रणाम किया और कहने लगे कि हे माता आप यहाँ अकेले क्या कर रही हैं भगवान भोले नाथ कहाँ हैं। राम जी के मुंह से एसी बात सुनकर सती जी बहुत लज्जित हुई और मन में अति संकोच के साथ शंकर जी के पास पहुंची। शंकर जी के पूछने पर सती जी ने झूठ बोल दिया कि मैंने आपकी बात पर यकीं कर किसी तरह की कोई परीक्षा नही ली। परन्तु भोले नाथ सब जान चुके थे। वे इस बात से बहुत दुखी हुए कि सती ने सीता जी का रूप बनाया ।
शंकर जी सोचने लगे कि राम जी मेरे इष्ट देव हैं और इस नाते सीता जी माता है । मैं अब सती को पत्नी के रूप में नही देख सकता । अतः मन ही मन सती जी का त्याग कर दिया और तपस्या करने बैठ गए । उधर सती जी भी जान चुकी थी कि शंकर जी ने मेरा परित्याग कर दिया है।
इसके आगे की कथा आप अगले भाग में पढ़ें गे ।
जय श्री राम


जय भोले नाथ

एक बार भगवान भोले नाथ सती जी के साथ कैलाश पर्वत की ओर जा रहे थे। उसी समय प्रभू श्री राम अपने बनवास काल मे दण्डक वन में विचरण कर रहे थे। और सीता जी की खोज मे दोनों भाई दुखी दिखाई दे रहे थे। शंकर जी अपने मन में विचार करते जा रहे थे कि कैसे प्रभू के दर्शन होंगे । क्योंकि इस अवतार में प्रभू राम गुप्त रूप में प्रकट हुए थे। तभी मार्ग में राम जी से भेंट हुई। श्री राम ने पिता सहित अपना नाम बताया और शंकर जी को प्रणाम किया। उधर शंकर जी भी प्रभू राम की जय बुला कर सती जी के साथ अपने रास्ते चल दिए । शंकर जी मन ही मन आनंदित हो रहे थे। अपने प्रभू के दर्शन से उनके मन मे प्रेम समा नही रहा था।
शंकर जी की यह दशा सती जी से छुपी ना थी। उनके मन में संदेह उत्पन्न हो गया कि शंकर जी तो अविनाशी हैं सारा जगत उन्हें पूजता है तो उन्होंने एक राजा के बेटे को सच्चिदानन्द कह कर प्रणाम क्यूँ किया। क्या वो सच्चिदानन्द विष्णु भगवान एक मनुष्य के रूप में अवतार लेगें? और अगर ये सच भी है तो भी वो घट घट की जानने वाले क्या एक मूर्ख मनुष्य की भांति स्त्री को ढूंढते फिरेगे ?
शंकर जी से सती जी के मन की व्यथा छुपी ना थी। अतः उन्होंने सती जी को समझाने की बहुत कोशिश की परन्तु उनके मन से शंका समाप्त नही हो रही थी। तब शंकर जी ने कहा कि यदि तुम्हारे मन में इतना संदेह है तो जैसे तुम्हारा संदेह दूर हो वैसे परीक्षा लो। तब तक मैं यहाँ बट वृक्ष के नीचे बैठ कर प्रतीक्षा करता हूँ ।
तब सती जी जिस रास्ते से प्रभू श्री राम आ रहे थे उसी रास्ते पर सीता जी का ही रूप धर कर टहलने लगी। लक्ष्मण जी ने दूर से सती जी को पहचान लिया। वे मन में सोचने लगे का सती जी ने सीता जी का रूप क्यों धरा है। तभी श्री राम चन्द्र जी ने उनके पास जाकर प्रणाम किया और कहने लगे कि हे माता आप यहाँ अकेले क्या कर रही हैं भगवान भोले नाथ कहाँ हैं। राम जी के मुंह से एसी बात सुनकर सती जी बहुत लज्जित हुई और मन में अति संकोच के साथ शंकर जी के पास पहुंची। शंकर जी के पूछने पर सती जी ने झूठ बोल दिया कि मैंने आपकी बात पर यकीं कर किसी तरह की कोई परीक्षा नही ली। परन्तु भोले नाथ सब जान चुके थे। वे इस बात से बहुत दुखी हुए कि सती ने सीता जी का रूप बनाया ।
शंकर जी सोचने लगे कि राम जी मेरे इष्ट देव हैं और इस नाते सीता जी माता है । मैं अब सती को पत्नी के रूप में नही देख सकता । अतः मन ही मन सती जी का त्याग कर दिया और तपस्या करने बैठ गए । उधर सती जी भी जान चुकी थी कि शंकर जी ने मेरा परित्याग कर दिया है।
इसके आगे की कथा आप अगले भाग में पढ़ें गे ।
जय श्री राम
जय भोले नाथ
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