सम्पूर्ण रामचरित मानस चौपाई दोहा अर्थ सहित बालकांड भाग ( 4 )
जय श्री राम ।
इस भाग में तुलसीदास जी कहते हैं कि मैं उन श्री जानकी जी के चरण कमलों को प्रणाम करता हूँ जिनकी कृपा से ही मुझ को निर्मल बुद्धि प्राप्त होगी जिससे कि मैं इस पवित्र ग्रंथ की रचना कर पाऊँ गा ।
फिर मैं रघुकुल के नायक श्री राम चन्द्र जी की वंदना करता हूँ जो सर्वदा योग्य हैं जिनके कमल जैसे सुंदर नेत्र हैं जो सर्वदा ही धनुष बाण धारण किये रह्ते हैं और जो अपने भक्तों के संकट को नष्ट कर सब प्रकार से सुख देने वाले हैं ।
उस अयोध्या पुरी की वंदना करता हूँ जिसमें सबको पवित्र करने वाली सरयू नदी बहती है । फिर अयोध्या पुरी के सभी नर नारियों को प्रणाम करता हूँ जिन पर प्रभू की अत्यंत प्रीति है । तीनों रानियों सहित महाराजा दशरथ की मैं वंदना करता हूँ जिनके घर प्रभू श्री राम चन्द्र जी अवतरित हुए । मैं राजा जनक जी की वंदना करता हूँ जिनके घर जगत जननी श्री सीता जी प्रकट हुई ।
फिर मैं भरत लक्ष्मण शत्रुघ्न तीनों भाईयों की वंदना करता हूँ जिनका ह्रदय सदा श्री राम चन्द्र जी के चरण कमलों में लगा रहता है । श्री हनुमान जी की वंदना करता हूँ जिनके यश का वर्णन श्री राम चन्द्र जी ने स्वयं अपने मुख से किया है । जिनके ह्रदय में धनुष धारण किये प्रभू श्री राम चन्द्र जी सदा निवास करते हैं ।
फिर इसके पश्चात् मैं विभिशण जी, जाम्बवत जी, अंगद सुग्रीव नल नील आदि सभी वानर समूह की वंदना करता हूँ जिनको उस अधम शरीर से भी प्रभू श्री राम चन्द्र जी की प्राप्ति हो गई ।
जय श्री राम ।
इस भाग में तुलसीदास जी कहते हैं कि मैं उन श्री जानकी जी के चरण कमलों को प्रणाम करता हूँ जिनकी कृपा से ही मुझ को निर्मल बुद्धि प्राप्त होगी जिससे कि मैं इस पवित्र ग्रंथ की रचना कर पाऊँ गा ।
फिर मैं रघुकुल के नायक श्री राम चन्द्र जी की वंदना करता हूँ जो सर्वदा योग्य हैं जिनके कमल जैसे सुंदर नेत्र हैं जो सर्वदा ही धनुष बाण धारण किये रह्ते हैं और जो अपने भक्तों के संकट को नष्ट कर सब प्रकार से सुख देने वाले हैं ।
उस अयोध्या पुरी की वंदना करता हूँ जिसमें सबको पवित्र करने वाली सरयू नदी बहती है । फिर अयोध्या पुरी के सभी नर नारियों को प्रणाम करता हूँ जिन पर प्रभू की अत्यंत प्रीति है । तीनों रानियों सहित महाराजा दशरथ की मैं वंदना करता हूँ जिनके घर प्रभू श्री राम चन्द्र जी अवतरित हुए । मैं राजा जनक जी की वंदना करता हूँ जिनके घर जगत जननी श्री सीता जी प्रकट हुई ।
फिर मैं भरत लक्ष्मण शत्रुघ्न तीनों भाईयों की वंदना करता हूँ जिनका ह्रदय सदा श्री राम चन्द्र जी के चरण कमलों में लगा रहता है । श्री हनुमान जी की वंदना करता हूँ जिनके यश का वर्णन श्री राम चन्द्र जी ने स्वयं अपने मुख से किया है । जिनके ह्रदय में धनुष धारण किये प्रभू श्री राम चन्द्र जी सदा निवास करते हैं ।
फिर इसके पश्चात् मैं विभिशण जी, जाम्बवत जी, अंगद सुग्रीव नल नील आदि सभी वानर समूह की वंदना करता हूँ जिनको उस अधम शरीर से भी प्रभू श्री राम चन्द्र जी की प्राप्ति हो गई ।
जय श्री राम ।
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