सम्पूर्ण रामचरित मानस चौपाई दोहा अर्थ सहित बालकांड भाग ( 2 )
जय श्री राम
तुलसीदास जी रामचरित मानस को लिखने से पहले सभी देवी देवताओं की वंदना के साथ ही उन दुष्ट मनुष्यों की वंदना भी करते हैं जो पराये सुख को देख कर अत्यंत दुःखी हो जाते हैं और दूसरे के दुःख को देख कर बहुत ही सुख पाते हैं । एसे लोग पराये दोषों को हजारों मुख से कहने की क्षमता रखते हैं । और हमेशा दूसरों का बुरा होने की कामना करते हैं ।
परन्तु दूसरी ओर सदपुरूष जो सदा दूसरों की मंगल कामना करते हैं । तुलसीदास जी कहते है कि जैसे कमल और जौंक दोनो जल में साथ साथ रहते हैं तथापि उन के गुण दोष एक दूसरे से बिलकुल अलग होते हैं । एसे ही संत और दुष्ट एक ही संसार मे रहते हुऐ भी एक दूसरे से बिलकुल भिन्न होते हैं । अमृत और मदिरा दोनों के पिता एक ही होने पर भी दोनों के गुण पृथक हैं एसे ही संत अमृत और दुष्ट मदिरा के समान है
तुलसीदास जी लिखते हैं कि साधु और सच्चे पुरुष चाहे कैसे भी कुवेश में क्यों ना हों तथापि उनका सर्वदा सम्मान ही होता है जैसे हनुमान जी और जाम्बवत जी आज भी जगत में पूजनीय हैं । सुसंगति और कुसंगति का असर हर जीव पर बहुत गहरा होता है इस बात को भी तुलसीदास जी ने कई उदाहरणों से समझाया है।
तुलसीदास जी कहते हैं कि मैं रामचरित मानस को लिखना चहता हूं परन्तु मेरी बुद्धि बहुत ही छोटी है अतः प्रभू श्री राम जी मेरी इस मूढ़ता को क्षमा करें और मुझ पर कृपा करें । क्योंकि मेरी बुद्धि बहुत ही छोटी है और मनोरथ राजा के समान बहुत बड़ा है ।
जय श्री राम ।
तुलसीदास जी रामचरित मानस को लिखने से पहले सभी देवी देवताओं की वंदना के साथ ही उन दुष्ट मनुष्यों की वंदना भी करते हैं जो पराये सुख को देख कर अत्यंत दुःखी हो जाते हैं और दूसरे के दुःख को देख कर बहुत ही सुख पाते हैं । एसे लोग पराये दोषों को हजारों मुख से कहने की क्षमता रखते हैं । और हमेशा दूसरों का बुरा होने की कामना करते हैं ।
परन्तु दूसरी ओर सदपुरूष जो सदा दूसरों की मंगल कामना करते हैं । तुलसीदास जी कहते है कि जैसे कमल और जौंक दोनो जल में साथ साथ रहते हैं तथापि उन के गुण दोष एक दूसरे से बिलकुल अलग होते हैं । एसे ही संत और दुष्ट एक ही संसार मे रहते हुऐ भी एक दूसरे से बिलकुल भिन्न होते हैं । अमृत और मदिरा दोनों के पिता एक ही होने पर भी दोनों के गुण पृथक हैं एसे ही संत अमृत और दुष्ट मदिरा के समान है
तुलसीदास जी लिखते हैं कि साधु और सच्चे पुरुष चाहे कैसे भी कुवेश में क्यों ना हों तथापि उनका सर्वदा सम्मान ही होता है जैसे हनुमान जी और जाम्बवत जी आज भी जगत में पूजनीय हैं । सुसंगति और कुसंगति का असर हर जीव पर बहुत गहरा होता है इस बात को भी तुलसीदास जी ने कई उदाहरणों से समझाया है।
तुलसीदास जी कहते हैं कि मैं रामचरित मानस को लिखना चहता हूं परन्तु मेरी बुद्धि बहुत ही छोटी है अतः प्रभू श्री राम जी मेरी इस मूढ़ता को क्षमा करें और मुझ पर कृपा करें । क्योंकि मेरी बुद्धि बहुत ही छोटी है और मनोरथ राजा के समान बहुत बड़ा है ।
जय श्री राम ।
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