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Showing posts from June, 2020

सम्पूर्ण रामचरित मानस चौपाई दोहा अर्थ सहित बालकांड भाग ( 6 )

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जय श्री राम जी ।        सतयुग में ध्यान करने से , त्रेता युग में यज्ञ करने से , द्वापर युग में पूजा करने से प्रभू प्रसन्न होते थे परन्तु कलयुग में तो केवल नाम का जप करने से ही संसार की समस्त आपदाओं का नाश हो जाता है ।        प्रभू का नाम  चाहे भाव से, कुभाव से,   ईर्ष्या से  या आलस्य से कैसे भी लिया जाए सदा कल्याण ही करता है । इसी नाम का सहारा लेकर मैं प्रभू की इस सुन्दर कथा का वर्णन कर रहा हूँ  वही मेरी इस कथा की रचना के प्रयास  को  सफल करें गे। जय श्री राम । 

सम्पूर्ण रामचरित मानस चौपाई दोहा अर्थ सहित बालकांड भाग ( 5 )

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जय श्री राम ।        यहाँ गोस्वामी तुलसीदास जी राम नाम की महिमा का वर्णन कर रहे हैं इस नाम के दोनों अक्षर रकार् व मकार् भक्तों को सुख देने वाले और कल्याण करने वाले हैं । ये दोनों अक्षर अमृत और संतोष के समान है जो  भक्तों के मन रूपी भ्रमर के लिए कमल की तरह है । ये सब वर्णो पर छत्र और मुकुट के समान शोभा पाते हैं । इस प्रकार नाम का प्रभाव प्रभू के निर्गुण स्वरूप से कहीं बढ़ा है और उसकी महिमा अपार है । इसीलिए तुलसीदास जी कहते हैं कि राम से भी बढ़ा उनका नाम  है।   श्री राम चन्द्र जी ने अपने भक्तों को सुख देने के लिए नर का शरीर धारण करके संकट सहते हुए साधू पुरूषों को सुखी किया परंतु प्रेम से नाम का जप करने वाले अनायास ही  तर  जाते हैं । राम जी ने तो केवल एक मात्र अहिल्या का ही उद्धार किया है प्रंतु नाम ने तो कितने ही भक्तों का उद्धार किया ।        नाम और नामी में कोई अंतर नहीं है ये वो शक्तियां हैं  जिनका आवाह्न किया जाता है जो ईश्वर की उपाधियां हैं जिन्हें अकथ और अनादि बताया गया है ।  ...

सम्पूर्ण रामचरित मानस चौपाई दोहा अर्थ सहित बालकांड भाग ( 4 )

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जय श्री राम ।        इस भाग में तुलसीदास जी कहते हैं कि मैं उन श्री जानकी जी के चरण कमलों को प्रणाम करता हूँ जिनकी कृपा से ही मुझ को  निर्मल बुद्धि प्राप्त होगी जिससे कि मैं इस पवित्र ग्रंथ की रचना कर पाऊँ गा ।        फिर मैं रघुकुल के नायक श्री राम चन्द्र जी की वंदना करता हूँ जो सर्वदा योग्य हैं जिनके कमल जैसे सुंदर नेत्र हैं जो सर्वदा ही धनुष बाण धारण किये रह्ते हैं और जो अपने भक्तों के संकट को नष्ट कर सब प्रकार से सुख देने वाले हैं ।  उस अयोध्या पुरी की वंदना करता हूँ जिसमें सबको पवित्र करने वाली सरयू नदी बहती है । फिर अयोध्या पुरी के सभी नर नारियों को प्रणाम करता हूँ जिन पर प्रभू की अत्यंत प्रीति है । तीनों रानियों सहित महाराजा दशरथ की मैं वंदना करता हूँ जिनके घर प्रभू श्री राम चन्द्र जी अवतरित हुए । मैं राजा जनक जी की वंदना करता हूँ जिनके घर जगत जननी श्री सीता जी प्रकट हुई ।        फिर मैं भरत लक्ष्मण शत्रुघ्न तीनों भाईयों की वंदना करता हूँ जिनका ह्रदय सदा श्री राम चन्द्र जी के...

सम्पूर्ण रामचरित मानस चौपाई दोहा अर्थ सहित बालकांड भाग ( 3 )

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जय श्री राम । एहि मैं रघुपति नाम उदारा अति पावन पुराण श्रुति सारा मंगल भवन अमंगल हारी उमा सहित  जहं जपत पुरारी               इसमें उदार श्री राम जी का चरित्र है जो बड़ा पवित्र और वेदों पुराणों का सार है वह नाम मंगल का घर और  अमंगल को हरने वाला है जिसको पार्वती जी सहित श्री शिवजी ने भी जपा है ।        तुलसीदास जी कहते हैं कि मेरी बुद्धि छोटी है और मेरी कविता भी भद्दी है । मुझ मे लिखने का कोई गुण नहीं ना ही मुझे कविता के अंगों का कोई विशेष ज्ञान है। तथापि इस में श्री राम चन्द्र जी की मंगल करने वाली कथा रस का वर्णन है इस से मेरी यह भद्दी रचना भी संसार मे यश पाएगी और लोकप्रिय हो जाए गी और सब मनुष्यों को एसे प्रिय लगेगी जैसे शमशान की भस्म अपवित्र होते हुए भी शिवजी के शरीर को लग कर अत्यंत पवित्र हो जाती है ।     जैसे चंदन का उपयोग उसकी खुशबू के कारण किया जाता है । काली गाय का दूध हितकारी समझ कर उपयोग होता है एसे ही मेरी इस कविता को राम नाम के कारण पवित्र समझ कर  गुणीजन व ज्ञ...

सम्पूर्ण रामचरित मानस चौपाई दोहा अर्थ सहित बालकांड भाग ( 2 )

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जय श्री राम        तुलसीदास जी रामचरित मानस को लिखने से पहले सभी देवी देवताओं की वंदना के साथ ही उन दुष्ट मनुष्यों की वंदना भी करते हैं जो पराये सुख को देख कर अत्यंत दुःखी हो जाते हैं और दूसरे के दुःख को देख कर बहुत ही सुख पाते हैं । एसे लोग पराये दोषों को हजारों मुख से कहने की क्षमता रखते हैं । और हमेशा दूसरों का बुरा होने की कामना करते हैं ।          परन्तु  दूसरी ओर सदपुरूष जो सदा दूसरों की मंगल कामना करते हैं । तुलसीदास जी कहते है कि जैसे कमल और जौंक दोनो जल में साथ साथ रहते हैं तथापि उन के गुण दोष एक दूसरे से बिलकुल अलग होते हैं । एसे ही संत और दुष्ट एक ही संसार मे रहते हुऐ भी एक दूसरे से बिलकुल भिन्न होते हैं । अमृत और मदिरा दोनों के पिता एक ही होने पर भी दोनों के गुण पृथक हैं एसे ही संत अमृत और दुष्ट मदिरा के समान है        तुलसीदास जी लिखते हैं कि साधु और सच्चे पुरुष चाहे कैसे भी कुवेश में क्यों ना हों तथापि उनका सर्वदा सम्मान ही होता है जैसे हनुमान जी और जाम्बवत जी आज भी जगत में पू...

सम्पूर्ण रामचरित मानस चौपाई दोहा अर्थ सहित बालकांड भाग (1)

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जय श्री राम 1 )  वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि।       मंगलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥        गोस्वामी तुलसीदास जी ग्रंथ आरंभ के लिए सबसे पहले गणेश जी और सरस्वती जी की वंदना करते हुए कहते हैं कि जो समस्त वर्णो अर्थ  समूहों रसों और छंदों सब प्रकार के मंगलों के करता है उन गणेश जी और सरस्वती जी को मैं प्रणाम करता हूँ । 2 )  भवानीशंकरौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ।       याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तःस्थमीश्वरम्‌॥              फिर मैं उन भवानी और शंकर जी की वंदना करता हूँ जो श्रद्धा और विश्वास की मूर्ति है । और जिनकी कृपा  के बिना       सिद्ध पुरुष भी अपने ह्रदय में स्थित ईश्वर को नहीं  देख पाते । 3 ) वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शंकररूपिणम्‌।      यमाश्रितो हि वक्रोऽपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते!!           अब मैं अपने श्री गुरूदेव की वंदना करता हूँ जो श्री गुरू नारायण ज्ञान मय नित्य शंकर स्वरूप हैं और ज...