Guru Vandana
गुरूर ब्रहमा गुरूर विष्णु गुरूर देवो महेश्वरः गुरूर साक्षात परं ब्रहम तस्मय श्री गुरूवे नमः
गुरू को ब्रह्मा कहा गया है क्योंकि वह शिष्य को बनाता है उसे नया जन्म देता है । गुरू को विष्णु कहा गया है क्योंकि वह शिष्य की बुराई से रक्षा करता है और उसे इस काबिल बनाता है कि वह अपने परिवार का पालन कर सके । गुरू को महेश्वर कहा गया है क्योंकि वह शिष्य के सभी दोषों का संहार करता है ।
अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाले को गुरु कहते हैं । गुरू वह है जो प्रकाश का निराकरण करता है अथवा जो धर्म का मार्ग दिखाता है । गुरू को ईश्वर से भी ऊॅचा दरजा दिया गया है । गुरू अथवा ज्ञान का वह प्रकाश पुंज जो शिष्य के अज्ञान रूपी अंधकार को दूर कर उसे काबिल इंसान बनाता है ।
सनातन धर्म में गुरू और शिष्य की परम्परा अनंत काल से चली आ रही है । रामायण महाभारत काल मे भी गुरू से शस्त्र और शास्त्र दोनों की शिक्षा प्राप्त कर बड़े बड़े राजाओं ने अपने जीवन को धन्य किया है ।
गुरू की महिमा अपार और अनंत है । इंसान के सबसे पहले गुरू माता और फिर पिता होते हैं । जो उसे जीना सिखाते हैं । फिर वो सब गुरू जिनसे दुनियावी और व्यवहारिक ज्ञान सीखते हैं ।
रामचरित मानस की रचना करने से पहले गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपनी कई चौपाई और दोहों में गुरू वंदना की है ।
यहां श्री संजीव चौहान जी द्वारा गायी हुई गुरू वंदना का लिंक दे रही हूँ जिसे लय बद्ध भी संजीव चौहान जी ने ही किया है ।
जय श्री राम ।
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